क्या मैं दिनकर तो नहीं!

By Anurag Vatsya · · Reading...
क्या मैं दिनकर तो नहीं!

हूँ मैं दिनकर के देश – प्रदेश से,

गंगा की धारा में, बिहार के मिट्टी में, आकाश के प्रमाण में |

जीवन के हर पराव में, न्याय की गुहार में, शिक्षा के आभाव में,

लिए सपने समाज के सुधर का – हे दिनकर आज तुम्हें जगाता हूँ |

हूँ कर रहा प्रश्न तुमसे – तुम्हारे जीवित छन्दों से,

चित्रण जो महाभारत का किया था तुमने |

उठ रहे कई सवाल थे -

यह प्रश्न है! पिछरे पण का, धर्म के अश्रु का!

महिलाओं के सम्मान का! धुंध हुए लम्हों का!

 

दिनकर!

ये तुमने ही तो कहा था न –

प्रलापी! ओ उजागर धर्म वाले!

बड़ी निष्ठा, बड़े सत्कर्म वाले!

किया था प्रश्न तुमने ओझल हुई धर्म कहीं,

प्यासे बैठे थे न्याय के आशंकित – रो रहा था धर्म कहीं |

अभिमन्यु, द्रौपदी, पांडवों के संघर्ष में उठे कई प्रश्न थे,

सुयोधन, कौरवों के कर्म में छुपे थे दर्द धर्म के |

कहा चले गये तुम दिनकर – धर्म के इस पराव में,

देखो रो रहा ये धर्म एक बार फिरे – पुकारते कृष्ण को|

 

दिनकर!

ये तुमने ही तो कहा था -

सभा में द्रौपदी को खिंच लाके,

सुयोधन की उसे दासी बता के |

इस कलयुग में पुकारता धर्म एक बार फिरे न्याय को,

सुयोधन! कौरवों! के जैसे अधर्मियों के मर्दन को |

पुकारता! चिलता! ये समाज है –

दर्द से कहराता हर स्त्री की आवाज है,

कृष्ण! कृष्ण! की चीखे तुम्हारे जीवन को पुकार रही है|

आओ मेरी कलम में लिखो फिर कुछ ऐसा,

जगा दे फिर एक कृष्ण को! उठा दे हर घर एक कृष्ण को!

 

दिनकर!

लगता है मेरे अंदर भी तुम हो, मेरे कलम में भी,

सायद मैं भी दिनकर ही तो नहीं होता जा रहा हूँ |

--anurag_vatsya

--अनुराग_वत्स 


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“To soothe — and to unsettle. To reveal what comfort hides.”

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— Anurag Vatsya

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